बच्चों के दफनाने की परंपरा: यह विषय काफी रोचक और गहराई से जुड़ा हुआ है, क्योंकि इसमें हिंदू धर्म के मृत्यु संस्कारों की अलग-अलग परंपराओं का वर्णन किया गया है। गरुड़ पुराण के अनुसार, छोटे बच्चों और संन्यासियों का दाह संस्कार न करने के पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक तर्क दिए गए हैं।
बच्चों के दफनाने की परंपरा
गरुड़ पुराण के अनुसार, 27 महीने तक के बच्चों की मृत्यु होने पर उन्हें अग्नि संस्कार के बजाय दफनाया जाता है। इसके पीछे मुख्य कारण यह माना जाता है कि इतने छोटे बच्चे अभी मोह-माया और सांसारिक बंधनों में नहीं बंधे होते। इसीलिए उनकी आत्मा को मुक्त करने के लिए दाह संस्कार की आवश्यकता नहीं होती।
इसके अलावा, यदि बच्चे की मृत्यु गंगा नदी के निकट हुई हो, तो उसे गंगा में प्रवाहित कर दिया जाता है। यह हिंदू मान्यता के अनुसार आत्मा की मुक्ति का मार्ग माना जाता है।
वयस्कों और बुजुर्गों का अग्नि संस्कार क्यों किया जाता है?
हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि जैसे-जैसे व्यक्ति बड़ा होता है, वह संसार के मोह-माया में बंधने लगता है। मृत्यु के बाद उसकी आत्मा अपने शरीर से अलग तो हो जाती है, लेकिन वह पुनः शरीर में लौटने की कोशिश कर सकती है। इसीलिए मृत शरीर के मुँह, आँख, कान और नाक को बंद कर दिया जाता है ताकि आत्मा वापस प्रवेश न कर सके।
अग्नि संस्कार का महत्व इसलिए भी है कि यह शरीर को पूरी तरह नष्ट कर देता है, जिससे आत्मा भौतिक शरीर से पूरी तरह मुक्त हो जाती है और अगले जन्म या मोक्ष की ओर बढ़ती है।
संन्यासियों का दफनाया जाना
संन्यासी वे होते हैं जिन्होंने पहले ही अपने सांसारिक मोह-माया को त्याग दिया होता है। इसलिए उनकी आत्मा को मुक्त करने के लिए दाह संस्कार की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि संन्यासियों को भी दफनाया जाता है, जैसे कि छोटे बच्चों को।
निष्कर्ष
हिंदू धर्म में मृत्यु संस्कार केवल एक परंपरा नहीं बल्कि आत्मा की मुक्ति से जुड़ी एक गहरी प्रक्रिया है। बच्चों और संन्यासियों को दफनाने की परंपरा यह दर्शाती है कि हिंदू धर्म आत्मा के विकास की विभिन्न अवस्थाओं को मान्यता देता है और मृत्यु के बाद आत्मा की यात्रा को भी गहराई से समझता है।








