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नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़: एक अनियोजित अनाउंसमेंट ने छीनी 18 ज़िंदगियाँ

By Raj Bharti

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नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़
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15 फरवरी की रात, नई दिल्ली रेलवे स्टेशन का प्लेटफॉर्म नंबर 14 एक भयावह हादसे का गवाह बना। रात लगभग 9:30 बजे, यहां मची भगदड़ में कम से कम 18 लोगों की दर्दनाक मौत हो गई। मृतकों में 11 महिलाएं और चार मासूम बच्चे भी शामिल थे।

ट्रेन का नाम, प्लेटफॉर्म की भीड़ और एक भयानक हादसा

इस रात प्रयागराज एक्सप्रेस प्लेटफॉर्म नंबर 14 पर पहले से ही खड़ी थी। इसी समय स्वतंत्रता सेनानी एक्सप्रेस और भुवनेश्वर राजधानी जैसी ट्रेनें भी देर से चल रही थीं, जिससे प्लेटफॉर्म नंबर 12, 13 और 14 पर अत्यधिक भीड़ जमा हो गई थी। प्लेटफॉर्म पहले से ही पूरी तरह भरा हुआ था, जब एक ऐसा अनाउंसमेंट हुआ जिसने लोगों में भ्रम और घबराहट पैदा कर दी।

घोषणा की गई कि “प्रयागराज स्पेशल” नाम की एक और ट्रेन प्लेटफॉर्म नंबर 16 पर आने वाली है। प्रयागराज एक्सप्रेस पहले से ही भीड़ से खचाखच भरी हुई थी और लोग उसमें चढ़ नहीं पा रहे थे। ऐसे में जब उन्होंने “प्रयागराज स्पेशल” का नाम सुना, तो कई यात्री दोनों ट्रेनों के नामों में कंफ्यूज हो गए और यह सोचते हुए कि शायद वही ट्रेन प्लेटफॉर्म बदलकर 16 पर आ रही है, बड़ी संख्या में लोग फुट ओवर ब्रिज की ओर दौड़ पड़े।

एक अनजानी अफ़रा-तफ़री और ज़िंदगी की कीमत

यह भीड़ जैसे ही ब्रिज पर चढ़ने लगी, वहां अफरातफरी और धक्का-मुक्की शुरू हो गई। सीमित जगह, भारी भीड़ और पैनिक के चलते लोग एक-दूसरे पर गिरने लगे। कई लोग नीचे गिरकर कुचल गए। एक छोटी बच्ची के सिर में कील घुस गई – यह सिर्फ एक उदाहरण है उस भयावहता का, जो उस रात लोगों ने झेली।

भीड़ में दबकर मरे लोग, सिस्टम की नाकामी का सबूत

सरकार की ओर से मृतकों के परिजनों को 10-10 लाख रुपये मुआवज़े का ऐलान किया गया है। लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ मुआवज़े से इस त्रासदी की भरपाई हो सकती है? क्या उन परिवारों को उनका इंसान वापस मिल सकता है?

जब हम सरकार को हर साल लाखों रुपये टैक्स के रूप में देते हैं, तो क्या यह अपेक्षा गलत है कि बुनियादी सुविधाएं और सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएं? खासकर ऐसे संवेदनशील स्थानों पर, जहां हर दिन लाखों की भीड़ आती-जाती है?

प्रयागराज एक्सप्रेस या स्पेशल? एक गलती, 18 मौतें

यह हादसा एक चेतावनी है, न केवल रेलवे प्रशासन के लिए, बल्कि पूरे सिस्टम के लिए कि भीड़ प्रबंधन को मज़ाक समझने की भारी कीमत जान देकर चुकानी पड़ सकती है।

अब समय है कि हम केवल मुआवज़े की घोषणा से आगे बढ़ें – और यह सुनिश्चित करें कि ऐसी घटनाएं दोबारा न दोहराई जाएं।

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